पर्यावरण संरक्षण मे महिलाओ की भूमिका

 

चेतना गजपाल1, डॉ. कुबेर सिंह गुरूपंच2

1शोधार्थी (भूगोल विभाग), शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर

स्वशासी महाविद्यालय दुर्ग, ;..द्ध

2निर्देषक, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग, (छत्तीसगढ़)

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

पर्यावरण मानव जीवन पद्धति के लिए यदि अनिवार्य अंग है तो इसका संरक्षण और बचाव भी मानव का परम कर्त्तव्य बन जाता है। पर्यावरण संरक्षण मानवीय जीवन के लिए अति आवश्यक विषय - वस्तु बन गया है। इस दिशा में वैश्विक एवं भारत दोनों ही स्तरों पर अनेक प्रयास एवं आन्दोलन अनवरत जारी है। पर्यावरण संरक्षण में स्त्री की भूमिका महत्वपूर्ण है। पर्यावरण को बचाने के लिए स्त्रियों ने योगदान दिया है। महिलायें वैदिक काल से ही पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में रही है। उसका उदाहरण तुलसी पूजा एवं वट वृक्ष पूजा है। भारतीय महिलायें सदैव इस दिशा में कार्यशील रही है। हमारी भारतीय ंसंस्कृति को देखने पर रीति-रिवाजों, परम्पराओं में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरुकता दिखाई देती रही है। भारतीय महिलायें सदैव से ही पर्यावरण संरक्षण में पुरुषों से आगे रही हैं इसका पता हमें विभिन्न पर्यावरण संरक्षण के आन्दोलनों का अध्ययन करने पर चलता है। महिलाओं ने पर्यावरण वनों की रक्षा के लिये कई आन्दलनों में भाग लिया इनमें अग्रणी भमिका निभायी है और अपने प्राणों की आहूति तक दी है। कार्ल मार्क्स का कथन है कि सृष्टि में कोई भी बड़े से बड़ा सामाजिक परिवर्तन महिलाओं के बिना नहीं हो सकता’’ अतः महिलाओं ने सदैव ही पर्यावरण संरक्षण की बात की है।

 

KEYWORDS: पर्यावरण संरक्षण आन्दोलन, महिलायें, प्राकृतिक वातावरण, पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं का योगदान।

 

 


INTRODUCTION:

मानव ने अपनी भोगवादी संस्कृति के बहकावे में आकर पर्यावरण में इतनी अधिक विकृति पैदा कर दी है, कि आज प्रदूषण रूपी दानव ने विकराल रूप धारण कर लिया है, जो कि केवल मानव के लिए बल्कि समस्त जीव जगत के लिए घातक सिद्ध हो रहा है और इस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण की समस्या का एक मात्र उपाय है सम्पूर्ण जनमानस को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना। पर्यावरण संरक्षण किसी एक देश या व्यक्ति की समस्या होकर विश्व के समस्त देशों एवं सम्पूर्ण जनमानस की समस्या है जिससे निपटने के लिए हमें एकजूट होकर प्रयास करने पड़ेंगे तभी परिणाम अच्छे प्राप्त होंगे।

 

पर्यावरण संरक्षण से तात्पर्य ऐसे विकास से हैं जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग तथा उनका नवीनीकरण बाधित हो। पर्यावरण संरक्षण का लक्ष्य है ‘‘विनाशरहित विकास’’ आज पर्यावरण का संरक्षण और सतत् विकास आवश्यक हो गया है। और वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त रूप से प्रयास किए जा रहे है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों, सम्मेलनों संगोष्ठियों विशेष कार्यों सामूहिक चर्चाओं द्वारा सम्पूर्ण जनमानस को पर्यावरण चेतना के प्रति जागरूक करने के प्रयास किए जा रहे है तथा भारतीय संविधान में भी पर्यावरण की सुरक्षा एवं सरक्षा के सम्बन्ध में वर्ष 1976 में संविधान के 42वें संशोधन के अन्तर्गत राज्य एवं नागरिकों को राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत अधिकार प्रदान किए गए है, यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 47 अनुच्छेद 48(), अनुच्छेद 48 () अनुच्छेद 51 , अनुच्छेद 51 () आदि अनुच्छेदों के माध्यम से देश के प्रत्येक नागरिक को यह मूलभूत दायित्व सौपा गया है कि सुरक्षा एवं संवर्द्धन के लिए प्रयत्नशील रहे। अतः इस प्रकार पर्यावरण संरक्षण के लिए संविधान के प्रावधानों अधिनियमों एवं कानून निर्माण के अलावा जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है वह है पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना, जिसके विभिन्न पक्ष होने चाहिए, जैसे सेमीनार, संगोष्ठी, प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रदर्शनी, प्रतियोगिताओं का आयोजन, शिक्षण संस्थाओं, गैर सरकारी संस्थाओं एवं समाज सेवी संगठनों द्वारा पर्यावरण जागरूकता के विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता एवं पर्यावरण जागरूकता के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है।

 

शोध का उद्देश्य

पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं की भूमिका का अध्ययन करना।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों की जागरूकता को बढ़ाना।

 

अध्ययन क्षेत्र की सामान्य जानकारी

प्रस्तुत शोध पत्र में अध्ययन क्षेत्र के रूप में भारत देष के क्षेत्रीय स्तर पर अलग-अलग राज्यों में महिलाओं द्वारा किये गये कार्यों के अनुसार क्षेत्र लिये गये हैं। जिनमें से भारत के राजस्थान राज्य के जोधपूर जिला, उत्तराखण्ड राज्य के चमोली अल्मोड़ा जिला को लिया गया है, इनके अलावा कर्नाटक राज्य, मध्यप्रदेष राज्य एवं छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले बस्तर जिले में भी महिलाओं द्वारा जो एतिहासिक कार्य हुए हैं उसके आधार पर भी विश्लेषण किया गया हैं।

 

शोध पद्धति

प्रस्तुत आलेख के अन्तर्गत वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन पर बल दिया गया है। द्वितीयक óोत के अन्तर्गत भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए महिलाओं द्वारा किये गये आन्दोलनों के सन्दर्भ में पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं द्वारा किए गए कार्यों एवं गतिविधियों उनकी डायरियों, समाचार पत्रों, पत्र-पत्रिकाओं पुस्तकों का अध्ययन कर चयनित विषय के लिए डाटा संग्रहित किए गए है तथा इसके साथ-साथ पर्यावरणविद् महिलाओं की आत्मकथाओं का विस्तृत अध्ययन करके पर्यावरण सुरक्षा में महिलाओं की भूमिका के सम्बन्ध में विभिन्न तथ्यों आंकड़ों का संकलन कर प्रस्तुत विषय पर शोध कार्य किया गया है। अतः इन óोतों की प्रविधियों के माध्यम से किया गया अध्ययन व्यावहारिक एवं विश्लेषणात्मक है जो कि शोध कार्यों में वैज्ञानिक वैधता स्थापित करने के साथ-साथ शोध को यथार्थ बनाने में भी सहायक है।

 

पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं की भूमिका

पर्यावरण और महिलाएं परस्पर एक दूसरे से यथार्थ रूप से जुड़े हुए है, इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है। पर्यावरण संरक्षण के लिए सम्पूर्ण भारतवर्ष में महिलाओं द्वारा समय पर आन्दोलन चलाकर आम नागरिको को पर्यावरणीय चेतना का सन्देश दिया गया। जिसके अन्तर्गत भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए महिलाओं द्वारा किये गये प्रमुख आन्दोलनों का संक्षिप्त परिचय निम्न है:-

 

(1) भारत में सर्वप्रथम राजस्थान में जोधपुर जिलें में 1730 . में महिलाओं के द्वारा पर्यावरण सरंक्षण के लिए चलाये गये खेजड़ी आन्दोलन द्वारा जो सराहनीय योगदान दिया गया वह बहुत ही महत्वपूर्ण रहा। जिसके अन्तर्गत खेजड़ली गाँव में अमृतादेवी के नेतृत्व में महिलाओं ने खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान कर दिया था। इस आन्दोलन में गॉंव के कुल 363 विश्नोईयों ने पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति दे दी। अतः इस प्रकार इस आन्दोलन में महिलाओं ने पेड़ों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर सम्पूर्ण जनमानस को पर्यावरणीय चेतना का सन्देश दिया।

 

(2) इसके पश्चात् भारत में पर्यावरण सुरक्षा के लिए महिलाओं द्वारा 1973-74 में भारत के उत्तराखण्ड राज्य में सुन्दर लाल बहुगुणा द्वारा प्रारम्भ किये गये चिपको आन्दोलन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया गया। इस आन्दोलन में उत्तराखण्ड की महिलाओं ने गौरा देवी के नेतृत्व में विशेष रूप से 1974 में भाग लिया। जिसके अन्तर्गत महिलाओं ने चमोली जिलें में वृक्षों से चिपक कर उनको काटने से रोका। इस आन्दोलन में समाज के सभी वर्गों के स्त्री पुरूष शामिल थे, परन्तु इस आन्दोलन महिलाओं की सहभागिता महत्वपूर्ण रही। सन् 1987 में इस आन्दोलन को सम्यक् जीविका पुरस्कार (राइट लाइवली हुड पुरस्कार) से सम्मानित किया गया।

 

(3) इसी क्रम में लगभग 1980 में चिपको आन्दोलन के प्रारम्भ एवं विकास की भांति उत्तराखंड में सुरक्षित पर्यावरण के लिए अल्मोड़ा जिलें में खनन विरोधी आन्दोलन विकसित हुआ। कई वर्ष पूर्व कानपूर के एक ठेकेदार ने सरकार से अल्मोड़ा के खिराकोट गाँव के क्षेत्र में खड़िया मिट्टी की खुदाई का पट्टा लिया था लेकिन इस गाँव की स्त्रियों ने खुदाई के दुष्प्रभाव को देखा कि खान का कचरा उनके संरक्षित वन को नष्ट कर रहा है। वर्षा के दिनों में खदान की यह धूल बहकर खेतों में पहुँच जाती है तथा उनमें पत्थर की तरह जम जाती है जिससे खेतों की जुताई असंभव हो जाती है तो गाँव की सभी स्त्रीयों ने संगठीत होकर खान में काम करने से मना कर दिया तथा पुरूषों पर भी खान में काम बंद करने का दबाव डाला और ठेकेदार के विरूद्ध आन्दोलन करते हुए अपने विरोध को इन शब्दों मे व्यक्त किया कि ‘‘उनकी खुदाई हमारी जिंदगी को तबाह कर रही है, हमारे बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है हम उन्हें कैसे खुदाई करने दे’’ ठेकेदार ने स्त्रियों के आन्दोलन को कुचलने के लिए अनेक उपक्रम किए लेकिन महिलाओं ने हार नहीं मानी बल्कि अदालतों के माध्यम से भी महिलाओं की लड़ाई जारी रही। तत्पष्चात दो वर्षो के बाद जिला मजिस्टेª ने गाँव का दौरा करने और होने वाले नुकसान को अपनी आँखों से देखने की रजामंदी दी तथा मौका मुआयना करने के पश्चात् जिलाधिकारी इतने द्रवित हुए कि उन्होंने फौरन मुकदमा निरस्त कर दिया और महिलाएँ मुकदमा जीत गई और सन् 1982 के आखिरी दिनों में औपचारिक रूप से खुदाई कार्य बंद कर दिया गया।

 

(4) इसी क्रम में अगस्त 1982 में दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में भी अप्पिको आन्दोलन प्रारम्भ हुआ, जो कि उत्तरी भारत के चिपको आन्दोलन से प्रेरित था। कन्नड़ भाषा के अप्पिको षब्द चिपको का ही पर्याय षब्द है। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में युवा एवं महिलाएॅं षामिल थे।

 

(5) सन् 1984 की भोपाल त्रासदी से गैस पीड़ित महिलाओं द्वारा व्यापक आन्दोलन का उदय हुआ। दो और तीन दिसम्बर सन् 1984 की रात को बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कम्पनी यूनियन कार्बाइड के स्वामित्व वाले भोपाल कीटनाशक संयत्र से लगभग 20 टन मिक (मिथाइल आइसोसायनेट) गैस बह गई। जिसके परिणामस्वरूप आज के सरकारी आंकड़े के अनुसार 4000 से अधिक 50000 लोगो के मौत होने की बात स्वीकार करते है। यह गैस निर्गध तथा अदृर्श्य है इस लिए अनुमानतः भोपाल के लगभग सारे पुराने शहर में गैस फैल गई थी।

 

प्रारम्भ से ही केवल गैस पीड़ित महिलाएं ही राहत चिकित्सा तथा सूचना सम्बन्धी अभियान में सर्वाधिक सक्रीय रही और आगे चलकर पीड़ित महिलाओं का संगठन जो कि बाद में आन्दोलन के मुख्य सूत्रधार के रूप में उभरा, वह गैस पीड़ित महिलाओं का संगठन था।

 

जब भारत सरकार यूनियन कार्बाइड के साथ एक शर्मनाक समझौता करती दिखाई पड़ी तो संगठन ने समझौते विरोध में व्यापक अभियान शुरू किया जिसके अन्तर्गत प्रदर्शनों, मुकदमें बाजी, प्रचार तथा अभिप्रेरण आदि रणनीतियाँ प्रयोग की गई और अन्त में 1989 नई सरकार के चुनाव के साथ ही महिला संगठन को एक बड़ी सफलता हाथ लगी।

 

(6) इसी क्रम में सन् 1985 मेघा पाटकर के नेतृत्व में नर्मदा घाटी की जैव विविधता को बचाने तथा मूल आदिवासियों के सांस्कृतिक पर्यावरण की रक्षा के लिए नर्मदा बचाओ आन्दोलन चलाया जा रहा है। जिसके साथ अब अरूंधति राय भी हो गई है। इस प्रकार सामान्यतः पर्यावरण संरक्षण के लिए सम्पूर्ण भारत वर्ष में महिलाओं द्वारा अनेक आन्दोलन चलाकर पर्यावरणीय चेतना के प्रति जागरूकता का जो संन्देश दिया वह अतिसराहनीय कार्य था।

 

(7) इसी क्रम में छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर जिले में अहम कदम उठाया गया है। बस्तर जहाँ प्रकृति की सौंदर्यता झलकती है, वहाँ की खूबसूरती देखने हजारों पर्यटक उमड़ पड़ते हैं। वहाँ के स्थलों को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए जिला प्रशासन की पहल पर पर्यटन समिति की महिलाओं स्व सहायता समूह की महिलाओं द्वारा कागज के थैले बनाए जा रहे हैं साथ ही वहाँ आने वाले पर्यटकों को भी इसके उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

 

(8) इसी प्रकार छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले में प्रत्येक वर्ष राज्य के निर्माण के उत्सव के रूप में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु छात्र छात्राओं द्वारा स्टॉल लगाकर लोगों को जागरूक किया जाता है। इस वर्ष 2022 के राज्योत्सव में स्टॉल के प्रवेश द्वार पर आकर्षक ढंग से लोगों को सिंगलयूज प्लास्टिक पर 1 जुलाई 2022 से प्रतिबंध को दर्शाकर जागरूक किया गया। जिसमें छात्रों द्वारा इस पहल में महत्वपूर्ण योगदान रहा।

 

(9) इसी तरह छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाने हेतु जलवायु से संबंधित समस्याओं के निपटान के लिए आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम चलाया गया। जिसके लिए वन जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा ग्रीन क्लब एवं कलिंगा विश्वविद्यालय के सहयोग से जन जागरूकता का कार्यक्रम चलाया गया। जिसके तहत 2 फरवरी को विश्व आर्द्र भूमि दिवस के अवसर पर लोगों को विश्वविद्यालय स्कूली छात्रों ने सफाई अभियान चलाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इसके अंतर्गत उन्होंने 285 किलोग्राम कचरा इकट्ठा कर नगर पालिकाओं को उचित निपटान हेतु सौंपा।

 

छत्तीसगढ़ में कुल 35 वेटलैंड है। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 2023 में विश्व भूमि दिवस के अवसर पर यह वाक्यआद्रभूमि बहालीदिया गया। इसके अंतर्गत पर्यावरण की स्थिरता को बनाए रखाजासके एवं आर्द्र भूमि को पारिस्थितिक तथा स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त हो, यह सुनिश्चित किया जा सके, का कार्यक्रम चलाया गया।

 

पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों की जागरूकता

भारत में पर्यावरणीय आन्दोलन एवं महिला नेतृत्व’’ पर अपने निर्देशक के मार्गदर्शन अपने गहन अध्ययन तथा विश्लेषनात्मक दृष्टिकोणों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के प्रति महिलाओं की भागीदारी उनके द्वारा सम्पूर्ण भारत को पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने की भूमिका को समकालीन समाज से जोड़े जाने का प्रयास है। लेकिन इसके अतिरिक्त अध्ययन के उद्देश्य के रूप में पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता की आवष्यकता है जिसे निम्न प्रकार से उल्लेखित किया गया है:-

1. पर्यावरण के विभिन्न घटको का मानव क्रिया-कलापों पर प्रभाव से लोगों को अवगत कराना।

2. पर्यावरण के प्रति जन-चेतना जागृत करना तथा इसके प्रति अवबोध विकसित करना।

3. पर्यावरण संरक्षण हेतु उर्वरकों किटनाषकों के प्रयोग को कम करना। बिजली, पानी, गैस का कम से कम उपयोग करना।

4. पर्यावरण वन्य जीव रक्षा के पुनीत कार्यो में महिलाओं की सक्रियता से बदलाव को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना।

5. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में सर्वप्रथम पर्यावरण संरक्षण के लिए अमृता देवी द्वारा किए गए कार्यों की वर्तमान में महत्ता बताकर युवापीढ़ी को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराना।

6. भारत में सुरक्षित पर्यावरण के लिए महिलाओं द्वारा किए गए विभिन्न आन्दोलनों की समकालीन समाज में प्रांसगिकता को उल्लेखित करना।

7. वैश्विक स्तर पर वंगारी मथाई द्वारा चलाए गए ‘‘ग्रीन बेल्ट आन्दोलन’’ की महता के आधार पर 21वीं सदी के विश्व को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना।

8. सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण के कार्यों मे लोगों को योगदान देना आवष्यक है जैसे कि घर के कचरे को सही तरीके से अलग कर, वृक्षारोपण कर, जैविक पदार्थों का उपयोग कर, जल का उचित उपयोग कर, प्लास्टिक का कम से कम उपयोग कर मानव अपना सहयोग दे सकते हैं।

 

निष्कर्ष

पर्यावरण के उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि पर्यावरण के अन्तर्गत बहुत-सी दषाओं का समावेष है। इसके अन्तर्गत वे सभी वस्तुएँ और दवाएँ सम्मिलित है जिनका हम अपने चारो ओर अनुभव करते है। इस जटिल समग्रता को समझने के लिए आवश्यक है कि हम पर्यावरण में सम्मिलित की जाने वाली सभी दशाओं का संक्षेप में विश्लेषण करें एवं उनका उचित उपयोग करें।

 

सन्दर्भ ग्रंथ सूची

1-    गर्ग, बी.एल. (2003). पर्यावरण प्रकृति और मानव, शब्द साधना, अजमेर, प्रथम संस्करण

2-    ओझा, डी.डी. (1999). पर्यावरण अवबोध, पवन कुमार शर्मा, साईन्टिफिक पब्लिशर्स, जोधपुर.

3-    चातक, गोविन्द (1991). पर्यावरण और संस्कृति का संकट, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण,

4-    सक्सेना,एच.एम. (1994). पर्यावरण तथा परिस्थितिकी भूगोल, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर.

5-    साहू, डॉ. बनवारी लाल (1997). पर्यावरण संरक्षण एवं खेजड़ी बलिदान, बोधि प्रकाशन जयपुर 302015 द्वारा प्रकाशित.

6-    सिंह, राजीव कुमार, (2009). पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास, पोइन्टर पब्लिशर्स, जयपुर.

7-    यादव, वीरेन्द्र सिंह, (2010). 21वीं सदी का पर्यावरवण आन्दोलन: चिन्तन के विविध आयाम, ओमेगा पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली.

8-    सक्सेना, एच.एम.,(2009). पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास, पोइन्टर पब्लिशर्स, जयपुर.

9-    शर्मा, डॉ. मालती (2011). पर्यावरण अध्ययन, शिवंाक प्रकाशन, दिल्ली प्रथम संस्करण.

 

पत्र-पत्रिकाएं

1- दैनिक शस्कर, जयपुर

2. दैनिक जागरण, नई दिल्ली

3. दी हिन्दू समाचार पत्र कस्तूरबा एण्ड सन्स लिमिटेड, नई दिल्ली

4. कुरूक्षेत्र प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली

5. नई दुनिया, जगदलपुर, छत्तीसगढ़

 

 

 

Received on 24.02.2023        Modified on 13.03.2023

Accepted on 27.03.2023        © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(2):116-120.

DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00017